सोमवार, 27 जनवरी 2014

आप का जल्द निपटना ज़रूरी


जी हां आप का यानी आप का नही आम आदमी पार्टी का जल्द निपटना ज़रूरी हो गया है...क्योंकि जितनी देर लगेगी इनको निपटने में उतनी दिक्कत हो जाएगी नरेंद्र मोदी की राह में....कांग्रेस तो दिल्ली समेत चार राज्यों में हार के बाद ये मान बैठी है कि अब खेल खत्म समझों अब चाहे राहुल आ जाए चाहे प्रियंका या सरदार जी या माता जी या कोई भी आ जाए उसका खेल फिल्हाल के लिए तो खत्म ही समझों...तो क्या राजनीति के धुरंधरों से भरी ये पार्टी ने ऩई तरकीब अपनाई है सत्ता में बने रहने की....आप क्या वाक्ई कांग्रेस की बी पार्टी है.....क्योंकि भले ही कांग्रेस सभी राज्यों में चुनाव हार गई हो लेकिन आम आदमी पार्टी जीती और कांग्रेस उसके दम में सत्ता में शामिल हो गई....अगर आम आदमी पार्टी न होती तो बीजेपी की सरकार दिल्ली में भी बनना तय था और ऐसे में कांग्रेस के लिए ज़्यादा दिक्क्त भरा सफर होता...लेकिन जिस तरीके से आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने मिली जुली सरकार बना ली.....उससे कंही न कंही ये ज़रूर लगने लगा है कि आप को सत्ता सुख को पाने के लिए किसी के साथ और किसी के भी हाथ से कोई परहेज़ नही है.....क्या आप अगर चुनावों से पहले जनता को जानकारी दे देती तो वो वक्त आने पर कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना लेगी तो क्या दिलली की जनता चुनावों में आम आदमी पार्टी को इतनी सीटे जिताती.....शायद क्या पक्का नही....अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित को संदीप दिक्षित को जितना गरियाया....जितनी भदद् केंद्र सरकार उसके मंत्रियों और खुद प्रधानमंत्री की आप ने चुनावों से पहले पीटी उतनी किसी ने नही पिटी...शायद यही वजह थी कि दिल्ली की मुख्यमंत्री को सीधे चुनौती दी और तमाम आरोप लगाए कि शीला भ्रष्ट है....चोर है बेईमान है....जेल में डालेंगें....यही नारे होते थे अरविंद के.....लेकिन अब कहां गए वो नारे वो दावे जिनके दम पर एक नौसिखिए को जनता ने करीब एक दशक तक राज करने वाली शीला दीक्षित को हरा दिया....क्या ये अरविंद का करिशमा था....अगर आप ऐसा सोचते है तो शायद नही पक्का गलत सोच रहे है......ये करिशमा था दिल्ली की जनता का....जिसने सोचा आप को वोट देकर वो कांग्रेस और उसके भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ शिकंजा कस सकते है....लेकिन बदले में क्या मिला.....धोखा...एक महिना हो गया अब मुख्यमंत्री जी  कांग्रेस के मंत्रियों के खिलाफ बोलना तो दूर बल्कि  कपिल सिब्बल समेत कई कांग्रेसी नेताओं  के गले मिल रहे है.... कल तक जिनको जेल पहुंचाने की बात हो रही थी...अब उनके खिलाफ क्यों मुख्यमंत्री जी की ज़ुबान पर ताले जड गए क्यों कोई भी मंत्री या आप का नेता कांग्रेस के खिलाफ एक लव्ज़ भी नही बोलता...क्या अंदरखाने कांग्रेस से सैटिंग हो गई या फिर ये सैटिंग पहले से ही थी...अगर ऐसा है तो क्या बिन्नी ने जो आरोप लगाए वो निराधार है....और आप में अभी और कितने बिन्नी मौजूद है.....क्या अरविंद केजरीवाल सत्ता के लालाच में आकर कथनी और करनी में फर्क करना भूल गए.....मुख्यमंत्री जी जो कहा वो करिए नही तो जनता के सामने जाने से पहले दो नही चार पांच बार सोच लेना.....यही नही जनता को भी ये सोचने को भी मजबूर ज़रूर कर दिया कि जिस जनता ने आपको दिल्ली में वोट देकर कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने की कोशिश की आप उसी की गोद में जाकर बैठ गए....अब क्या भरोसा कि केंद्र में भी यूपीए को सत्ता से बेदख्ल करने के लिए आप को वोट दे दिया और जाकर आप सोनियां जी को समर्थन दे बैठे तो जनता क्या करेगी
 
 

रविवार, 6 जुलाई 2008


ये क्या हो गया है न्यूज़ चैनलों को ?

न्यूज़ चैनलों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है.....ऐसे में समाचारों का क्या हाल हो गया है..... मानों हर ख़बर का चैनल अलग अलग तरीके से बलात्कार करते है...... पहले हम ये तस्वीरें लाएं.... पहले ये ख़बर हमने ब्रेक की.... इस लड़ाई में सभी लगे हुए है...... लोगों के पास इतनी फुर्सत नहीं कि वो करीब पचास न्यूज़ चैनलों की खबरें देखे...... ऐसे में अब नित नए तमाशे शुरू हो गए है......मंगल पर गंगा.....शिव ने की थी इस दुनियां की पहली सर्जरी गणेश के सिर पर हाथी का सिर लगाकर..... दो सांड़ों की लड़ाई पर आधे घंटे का विशेष...... रात को ग्यारह बजे के बाद सभी न्यूज़ चैनल बन जाते है हॉरर चैनल...... नही समझ में आता कि वो अपराध की ख़बरे बता रहे हैं..... या अपराध करने के तरीके या अपराध कर के बच निकलने के तरीके.... नही समझ में आता कि ख़बर आखिरकार कंहा रह गई..... ये भी किसी विंडम्बना से कम नही कि एक ऐसा चैनल जिसका न्यूज़ से कोई वास्ता ही नही....चैनलों की दौड़ में नंबर वन हो चुका है..... इससे बुरा पत्रकारिता के लिए क्या होगा...... लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि इस अंधी दौड़ में सभी भाग चुके है..... एक ही दिन में कई बड़ी ख़बरे एक साथ मुंबई में बाढ़ से तबाही....जम्मू में हिंसा में छह हिंदू मारे गए......पूरे देश में बंद के दौरान हर जगह हिंसक प्रदर्शन......श्री अमरनाथ श्रायन बोर्ड से ज़मीन वापस लेने का फरमान......एक ही दिन में कई बड़ी ख़बरें लेकिन सिर्फ और सिर्फ एनडीटीवी को छोड़कर एक भी चैनल पर ये ख़बरे नही..... दिखा रहे है दो कौड़ी के मीका के गाने....राजू श्रीवास्तव के हंसी ठठ्ठे या फिर कोई रिएलिटी शो...... चैनलों की स्ट्रेटेजी बनाने वाले ये भी भूल जाते है कि आखिर हम जनता को परोस क्या रहे है.... जनाब ज़रा ये भी तो सोचिए कि दर्शकों में बुद्धिजीवियों की भी कोई कमी नही है.....दो दो कौड़ी के स्पेशल जिन्हे सिर्फ आप और आपका चैनल ही स्पेशल कहता है उन पर कोई टिकता भी है या नंही.... ख़बरों से हटने का नतीजा कंही ये न हो कि न ख़बरों के रहे और न मनोरंजन के यानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का..... सब के सब अंधी दौड़ में दौड़ते जा रहे है....लेकिन इसका सबसे ज़्यादा फायदा हुआ है एनडीटीवी और टाईम्स नॉव को क्योंकि कम से कम इन चैनलों ने ख़बरिया चैनलों में अपना तमाशा नही बनने दिया.... ऐसे में सबसे ज़्यादा अगर कोई परेशान है तो वो है टीवी एंकर....कंही से अगर ग़लती से दो सांड़ों के लड़ते हुए शॉट्स आ गए या कंही कोई पति पत्नि लड़ पड़े और उनकी तस्वीरे कैमरे में कैद हो गई तो बस समझ लीजिए एंकर की मौत.....बनाने और कहने वाले कह देंगे आधे घंटे का स्पेशल...... अब बोलिए एक तस्वीर पर आधा घंटा और तो और घुस जाईए पति पत्नि के बेड़ रूम तक....... पीछे से फरमान ये कि इन्हे ऑन एयर लड़वा दो तो मज़ा आ जाए....... अब यंहा शुरू होता है एंकर का काम यानी एंकर खुद भी पके और जनता को भी पकाए....अगर बाहर निकल कर एंकर ने प्रोग्राम बनाने वाले की तारीफ कर दी तो शायद एंकर की भी तारीफ हो जाएगी....लेकिन अगर कुछ बुरा भला कह दिया....तो आप अच्छे एंकर नही है.....मान गए अफसरों को या कहे इस बंदर भालू के खेल तमाशे कराने वाले उस्तादों को......अब ऐसे में क्या होना चाहिए क्या.... लोग ऊब चुके है इन तमाशों को देख देख कर कोई एकाध घंटा ज़रूर ऐसा तमाशा दिखाईये लेकिन चैनल को तमाशा मत बनाईए.......

गुरुवार, 26 जून 2008


हिंदुस्तान में सब होता है लेकिन वंहा नहीं


जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा श्री अमरनाथ श्रायन बोर्ड को यात्रियों को सुविधाएं देने के लिए बालटाल में थोड़ी ज़मीन क्या दे दी मानों आसमान टूट पड़ा हो.....जो बवाल अलगाववादियों ने यां हम तो कहेंगे आतंकवादियों ने मचाया हद कर दी.....लेकिन ये सिर्फ हिंदुस्तान में ही होता है जनाब सीमा पार पाकिस्तान में नहीं....क्या कोई सोच सकता है कि पाकिस्तान में पाक प्रशासन अगर हज कमेटी को कंही कोई ज़मीन का टुकड़ा दे तो पाकिस्तान में इतना बवाल हो जाए.....शायद वंहा ऐसा करने की हिम्मत किसी में नही क्योंकि वंहा न तो प्रशासन उसे बख्शेगा और न ही आवाम.....लेकिन यंहा ऐसा कुछ नही है.....यंहा अगर श्री अमरनाथ श्रायन बोर्ड को थोड़ी ज़मीन दे दी जाती है तो उस पर सभी को एतराज है.....सभी बड़े नेताओें को भी नेता....वो नेता जिनकी कश्मीर में औकात दो कोड़ी से ज़्यादा नही है.....कभी ज़िंदगी में चुनाव तो लड़े नही और अगर लड़े तो शायद ज़मानत भी न बच पाए.........नेता जो खाते यंहा की है और गुण गाते है पाकिस्तान के.....कश्मीरी पंड़ितों का आरोप है गुलाम नबी आज़ाद ने वैसे तो आज तक कश्मीरी पंड़ितों के लिए कुछ नही किया....लगा ये यात्रियों के लिए न काफी ज़मीन देकर कुछ मरहम लगाने का काम ज़रूर किया जा रहा है....लेकिन वो भी वंहा के नेताओं को रास नही आया....कंस्ट्रक्शन का काम रूकवा कर ही दम लिया......जिन नेताओं ने इसका विरोध किया है....अगर उनमें हिम्मत है तो राज्य में अपनी सरकार क्यों नहीं बना लेते.....एक बार चुनाव मैदान में उतरे तो सही वोटिंग से पहले ही औकात समझ में आ जाएगी....कश्मिरियों के हिमायती होने का दम भरते है....और गोद में बैठते है पाकिस्तान की.....खाना पीना चलना फिरना सोना जागना दिन रात सब पाकिस्तान के इशारे पर.....लेकिन एक बात जग ज़ाहिर है कि जिस थाली में खाओ उसमें छेद तो भले ही कर दो लेकिन थूको मत......कश्मीरी आवाम को भी सोचना चाहिए कि उनके पास सिर्फ टूरिज़्म के अलावा रोज़ी रोटी कमाने का कोई और ज़रिया नही है....ऐसे में हर साल वंहा लाखों की तादाद में अमरनाथ यात्री आते है......जिससे राज्य सरकार को करोडों रुपयों की आमदनी होती है....ऐसे में अगर थोड़ी सी ज़मीन तीर्थयात्रियों के लिए मुहैय्या करवा भी दी गई है तो कौन सा आसमान टूट पड़ा.....लेकिन ये हिंदुस्तान है यंहा कुछ भी हो सकता है.......सरकारें आतंकवादी और दो दो कौड़ी के नेताओं के सामने झूक सकती है.....अपना फैसला कुछ लोगों की हिंसा की वजह से बदल सकती है......ड़र सकती है......हक की बात नही कर सकती है.....क्योंकि ये भारत है यंहा कुछ भी हो सकता है...

सोमवार, 2 जून 2008


नही लगता कि सज़ा कम है ?



विकास और विशाल यादव को नीतिश कटारा की हत्या का दोषी पाया गया....दफा ३०२ के तहत उन्हे दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत ने दोषी मानते हुए ताउम्र कैद की सज़ा सुनाई है....लेकिन जिस तरीके का जुर्म इन दोनों ने किया उसे रेयर ऑफ द रेयररेस्ट क्यों नही माना गया....हालांकि कोर्ट के फैसले पर कुछ लिखना बोलना ठीक नही क्योंकि जो कोर्ट ने किया वो सही है....लेकिन इन दोनों के साथ साथ डी पी यादव का रूतबा और विकास और विशाल का घमंड़ ज़रूर टूटा होगा...क्योंकि सभी का ये कहना कि अगर ये मामला उत्तर प्रदेश की किसी कोर्ट में चलता तो इन लोगों का कोई कुछ भी नही बिगाड़ सकता था....क्योंकि डी पी यादव का दबदबा कितना है सभी जानते है....लेकिन विकास यादव और विशाल को जब भी कोर्ट में लाया तो साफ तौलिये और दूधियां रंग के कपड़े शेव बनी हुई नहाए धोए लगते थे साथ में पुलिस वालों के साथ चलने में अपने आप को वो किसी सेलिब्रिटी से कम नही समझते थे.....और कोर्ट परिसर में पत्रकारों से मारपीट और बदतमीज़ी सभी ने देखी है....शायद ये पिता का रूतबा और पैसे का घमंड़ था.....लेकिन वो ये भूल गए कि घमंड़ तो रावण का भी नही रहा....अब जबकि निचली अदालत का फैसला उम्रकैद आ गया है....तब जाकर कंही डी पी यादव के चेहरे की हवाईयां भी उड़ी हुई दिखाई दी और उसके बददिमाग रईसज़ादों के चेहरे पर भी सारी उम्र जेल में रहने का ड़र सताने लगा...लेकिन उस मां ने अदालत के फैसले को सही ठहराया जिसमें कहा गया...उसके बेटे को ज़िंदा जलाने और इकलौटे बेटों को अपने गुस्से में आकर खत्म कर देने वालों को उम्रकैद लेकिन जब ये फैसला आया तो कोर्ट परिसर में कई लोग बोल उठे बच गए साले.....इनको तो लटका देना चाहिए था.....उस मां की भी जमकर तारीफ की गई....जिसने किसी बात की परवाह नही की और लड़ी पूरे सिस्टम से बाहुबलियों से लेकिन हार नही मानी....फिर धीरे धीरे सिस्टम मीडिया सब साथ हो लिए और जीत गई सच्चाई क्या लगता है आपको ये सज़ा काफी है एक सवाल जो पढ़े अपनी राय ज़रूर दें........















अगर गर्मी से परेशान हों तो इन तस्वीरों पर नज़र डालें शायद कुछ मन को छुने वाली और सुकून देने वाली तस्वीरें लगें....पिछले दिनों ही चक्कर लगा रोहतांग पास जंहा का दर्रा बर्फ से पूरी तरह ढ़का हुआ है......

गुरुवार, 22 मई 2008

आखिर इतनी लापरवाही क्यों ?


14साल की आरूशी और उसके नौकर हेमराज की हत्या की गुत्थी सुलझने को ही नही आ रही....दिन ब दिन पेंच उलझता ही जा रहा है.....ऐसे में पुलिस की जांच पर सवालिया निशान लगे हुए है......सवाल जिनके जवाब पुलिस के पास नही है......

1पुलिस आरूशी की हत्या वाले दिन तलवार परिवार के घर पहुंची...तो सीधे नौकर हेमराज पर शक ज़ाहिर कर दिया.....और उसकी तलाश में कई राज्यों में टीमें लगा दी....लेकिन उसका शव उसी घर की छत पर अगले दिन पड़ा मिला.....

2नौकर का शव मिलने के बाद पुलिस का दावा कि ये मर्डर नौकर ने किया है ग़लत साबित हुआ और एक मर्डर कैस से ये सारा मामला दोहरे हत्याकांड़ में तबदील हो गया.....

३ उसके बाद पुलिस ने दूसरे नौकर विष्णु पर शक ज़ाहिर किया तो वो भी बेकसूर निकला....

4पुलिस ने कई दिन बीत जाने के बाद भी किसी को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की ज़हमत नही उठाई....जिससे हो सकता है वारदात करने वाले के मन से अब कानून और पुलिस का ड़र निकल गया हो....

5पुलिस ने डॉ तलवार के गैराज और क्लिनिक पर छापे मारने में करीब 5दिन से ज्यादा का समय ले लिया....

6पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में साफ आ गया कि ये काम किसी कसाई का या फिर डाक्टर का हो सकता है जिसने बड़े ही प्रोफेश्नल तरीके से ये हत्याए की है....कसाई की संभावना कम और डाक्टर की संभावना यंहा ज़्यादा दिखती है क्योंकि तलावर दंपति डाक्टर है......

7तलवार परिवार से पूछताछ करने में पुलिस सकुचाती रही...कई दिनों के बाद पूछताछ की गई वो भी बिना गिरफ्तारी या कम से कम हिरासत में लेकर वो ऐसा कर सकते थे.....

8पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का ब्यान आता है तलवार दंपति के ब्यानों में विरोधाभास है...क्या अंतर है...उस पर पुलिस ने क्या किया.....कोई कार्यवाही नही.....

9हत्या तेज़धार हथियारों से की गई....लेकिन इस वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियारों का भी अभी तक कुछ पता नही......

10वो पलंग का गद्दा जिस पर आरूशी सो रही थी वो दूसरे की छत पर क्यों सुखाया अपनी छत पर क्यों नही क्या परिवार को पता था कि अपनी छत पर शव पड़ा है.....

11शव को छत पर घसीट कर ले जाया गया....करीब करीब एक ही वक्त पर दो लोगों की हत्या और परिवार को कुछ आवाज़ नही आई......जबकि पुलिस के मुताबिक दोनों कत्ल तलवार दंपति के साथ वाले कमरे में हुए......

12आरूशी और हेमराज के मोबाईल डिटेल निकालने का ख्याल पुलिस को करीब 4दिन बाद आया.....

13दोनों को मारने का तरीका बिल्कुल एक जैसा......मारने का वक्त करीब करीब एक जैसा....ऐसा नही हो सकता कि दोनों को एक साथ मारा हो....अगर एक एक कर के मारा होता तो चीखा चिल्ली ज़रूर हुई होती....

14आरूशी की मां का कहना है कि वो रात में आरूशी के कमरे को ताला लगाती थी इसकी क्या वजह थी....जब चाभी आरूशी की मां के पास होती थी तो रात में कैसे किसी ने ताला खोल लिया तोड़ा नही...और दंपति को पता तक नही चला.....

15क्यों पुलिस ने किसी को हिरासत में नही लिया.....क्यों पुलिस ने सख्ती नही दिखाई.....

16पुलिस भी मानती है कि लापरवाही तो हुई है तभी तो अपने एसपी और थाना प्रभारी का ट्रांस्फर और निलंबन किया.....लेकिन बावजूद उसके नतीजा ढांक के तीन पात

17पुलिस ने क्यों कहा कि दो दिन में कातिल सबके सामने होगा जबकि उसके पास एक सबूत तक मौजूद नही था....ऐसे में दो दिन बाद मुंह की खाने के बाद पुलिस को अंदाज़ा नही कि अपराधी के हौंसले कितने बढ़े होंगे.....

18इतिहास ग्वाह है किसी भी कैस को सुलझाने के लिए सबूतों की ज़रूरत होती है लेकिन यंहा ऐसा लगता है कि पुलिस पहले अपराधी को पकड़ना चाहती है.....और पुलिस को लगता है सबूत बाद में मिल जाएंगे.....

19 पोस्टमार्टम में आया है आरूशी के साथ बलात्कार नही हुआ है....और न ही नौकर ने शराब पी रखी थी.....अगर नौकर या उसके किसी साथी ने आरूशी को मारना होता तो वो रात में जब तलावर दंपति घऱ पर मौजूद थे तब क्यों कत्ल करते.....आरूशी के स्कूल की छुट्टियां थी और तलवार दंपति अपने काम से रोज़ बाहर जाते है....उनकी गैर मौजूदगी में वो वारदात को अंजाम देते

20ऐसा भी हो सकता है कि नौकर हेमराज या आरूशी में से किसी एक की हत्या करनी हो और दूसरे ने देख लिया हो और मजबूरन उसे भी मार देना पड़ा हो.....

ऐसे बीसीयों और सवाल है जिन्हे जल्द से जल्द पुलिस को सुलझाना होगा....और समय निकलता गया जैसे कि निकलता जा रहा है....तो अपराधी को पकड़ना मुशिकल ही नही नामुमकिन हो जाएगा...क्योंकि अपराधी वारदात के बाद ड़रा होता है लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते जा रहे है वैसे वैसे कातिल से जो कोई ग़लतियां हुई भी होंगी वो ध्यान से उनसे पार पाता जा रहा होगा.....यंहा सवाल पुलिस की साख बचाने का नही है....यंहा अब सवाल है एक मासूम बच्ची को और उसके नौकर को कत्ल करने का उसकी वजह का और शातिर अपराधी को धर दबौंचने का.....हमेशा कहा जाता है कि अपराधी कोई न कोई सुराग छोड़ जाता है यंहा क्या सुराग छूट गया है उसे तलाशने की बेहद ज़रूरत है.....पुलिस की लापरवाही की हद या कहे कि जितनी किरकिरी होनी थी हो चुकी.....समझ में नही आता कि आखिर पुलिस ने क्यों दिखाई इतनी लापरवाही.....

मंगलवार, 13 मई 2008

नन्हें उस्तादों के लिए बड़ा खतरा


पूरी दुनियां में अगर नन्हे उस्तादों की बात करे तो उन आंकड़ों में भी भारत उस्ताद या कहे अव्वल स्थान पर है....हिंदुस्तान में 1 दिन के उस्तादों की उम्र से लेकर 14 साल के उस्तादों की तादाद करीब 3 करोड़ 38 लाख से भी ज़्यादा है.....इन बच्चों को उस्ताद कहने के पीछे मकसद है छोटी उम्र में इन बच्चों का मानसिक विकास इतनी तेज़ी से हो रहा है....देख कर हैरानी होती है.... अगर तो ये विकास पॉज़िटिव है तब तो समझ में आता है लेकिन अगर ये नेगेटिव होता जा रहा है तो सबसे बड़ा खतरा समझ लिजिए.....पिछले दिनों ख़बर आई कि केलिफोर्नियां में एक पांचवी क्लास का उस्ताद हथियार लेकर स्कूल गया करीब 12 बच्चों और एक टीचर को मौत के घाट उतार दिया.....अब आप कहेंगें कि विदेशों में तो ऐसा होता ही रहता है....लेकिन जनाब याद कीजिए गुड़गांव का यूरो इंटरनेश्नल स्कूल जंहा के छात्र ने अपने घर पर रखी रिवॉलवर से तीन गोलियां अपने साथी छात्र के शरीर में उतार दी और आठवी क्लास के छात्र की वंही पर मौत हो गई.....कई मनोवैञानिकों से बातचीत से पता चला कि इन सनसनीखेज़ वारदातों के पीछे बड़ा रोल है पर्दे पर हिंसा देखना.... कई साल पहले घर की महिलाएं दिन भर टीवी पर प्रोग्राम देखा करती थी....लेकिन अब पिछले दो सालों में उनकी तादाद में भारी कमी देखी गई....और उनकी जगह ले ली है नन्हे उस्तादों ने 3 साल से लेकर 10 साल तक की उम्र के बच्चों में किसी भी तरह के टीवी सीरियल देखने की ललक पैदा हो चुकी है.....हमारे साथ भी तीन बच्चे रहते है आरूशी उम्र पांच साल पसंदीदा चैनल एनडीटीवी इमेजिन उसमें धर्मवीर....रामयण....राधा की बेटियां कुछ कर दिखाएंगी.....जस्सू बेन जयंती लाल जोशी की ज्वाईंट फैमिली.......ऩच ले वे में सरोज खान.....शरारत....मतलब ये कि शायद जितने भी सीरियल आते है वो सब पसंद है यानी जो आ रहा है वो देख सकते है.....दूसरा बच्चा पाखी उम्र 4 साल....जिसे पसंद है एनिमेटिड फिल्मस.....कार्टून्स.......बाल गणेशा....हनुमान.....हैरी पार्टर....और ढे़र सारी विडियो गेम्स....और तीसरा बच्चा है परी.....उम्र मात्र 11 महिने......लेकिन टीवी के चलते ही सारे खिलौने छोड़कर टीवी की तरफ एकटक देखना और 11 महिने के बच्चे को भी पता चलता है कि टीवी बंद हो गया अब रोना है.....कई बार सोच कर थोड़ा ड़र लगता है कि बच्चे जो देख रहे है या जो चैनल अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए बच्चों को परोस रहे है वो देखने दिखाने लायक है या नही.....कुछ समय पहले दिल्ली हाई कोर्ट के जज साहब को एक बच्ची ने चिट्ठी लिखी कि उसे गुड़िया या डॉल से ड़र लगता है क्योंकि उसमें उसे भूत दिखता है.....उसे रात होते ही ड़र लगता है ये बच्चे की नासमझी या ड़र नही बल्कि एक मानसिक बीमारी है जो कि चैनल ने दी है...... बच्चों के लिए एक कार्टून टीवी में जारी है शीन शेन....समझ में नही आता कि कोई भी अभिभावक कैसे उस कार्टून को देखने की इजाज़त अपने बच्चों को देख सकता है.....इस कार्टून का पात्र किसी की इज़्जत की दो कौड़ी की करने में दो सैकेंड़ लगाता है फिर चाहे वो उसकी मां हो पिता हो टीचर या घर आए मेहमान.....नही समझ में आता कि एक ऐसा कार्यक्रम जिसका मकसद सिर्फ बच्चों को बदतमीज़ी सिखाना है बावजूद उसकी टीआरपी रेटिंग काफी अच्छी है.....उसे क्यों देखा जाता है शायद हर मातापिता के ज़हन में ये सवाल ज़रूर आता होगी.......टीवी सीरियलज़ में खून खराबा...धोखा देना.....अपराध करना और बच निकलना.....उस्ताद सब सीख रहे है.....विम्हेन्स अस्पताल के डाक्टर जितेंद्र नागपाल से बात हुई तो उनके मुताबिक टेलिवज़न बच्चों के नेचर में ज़बरदस्त बदलाव कर रहा है.....उनकी सेहत और आंखों पर तो इसका बुरा प्रभाव पड़ ही रहा है.....साथ ही उनकी जीवनशैली उनमें बदले की भावना......आल्स्य......झूठ बोलने की आदत.....आंखों की कमज़ोरी....बड़ी तेज़ी से फैलते जा रहे है.....एक सर्वे के मुताबिक बच्चा टीवी से बहुत जल्दी सीखता है......अब ये टीवी के प्रोग्राम पर निर्भर करता है कि वो तेज़ी से सिखा क्या रहे है सही या ग़लत.......कम शब्दों में छोटा संदेश बच्चों को जब माता पिता की ज़रूरत हो तो माता पिता मिल जांए टीवी नही और जब खेल या शारीरिक क्षमताओं को बढ़ाने की ज़रूरत हो तो बच्चा सोफे पर बैठ कर विडियो गेम्स न देखे बल्कि मैदान में उतरे़