रविवार, 6 जुलाई 2008


ये क्या हो गया है न्यूज़ चैनलों को ?

न्यूज़ चैनलों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है.....ऐसे में समाचारों का क्या हाल हो गया है..... मानों हर ख़बर का चैनल अलग अलग तरीके से बलात्कार करते है...... पहले हम ये तस्वीरें लाएं.... पहले ये ख़बर हमने ब्रेक की.... इस लड़ाई में सभी लगे हुए है...... लोगों के पास इतनी फुर्सत नहीं कि वो करीब पचास न्यूज़ चैनलों की खबरें देखे...... ऐसे में अब नित नए तमाशे शुरू हो गए है......मंगल पर गंगा.....शिव ने की थी इस दुनियां की पहली सर्जरी गणेश के सिर पर हाथी का सिर लगाकर..... दो सांड़ों की लड़ाई पर आधे घंटे का विशेष...... रात को ग्यारह बजे के बाद सभी न्यूज़ चैनल बन जाते है हॉरर चैनल...... नही समझ में आता कि वो अपराध की ख़बरे बता रहे हैं..... या अपराध करने के तरीके या अपराध कर के बच निकलने के तरीके.... नही समझ में आता कि ख़बर आखिरकार कंहा रह गई..... ये भी किसी विंडम्बना से कम नही कि एक ऐसा चैनल जिसका न्यूज़ से कोई वास्ता ही नही....चैनलों की दौड़ में नंबर वन हो चुका है..... इससे बुरा पत्रकारिता के लिए क्या होगा...... लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि इस अंधी दौड़ में सभी भाग चुके है..... एक ही दिन में कई बड़ी ख़बरे एक साथ मुंबई में बाढ़ से तबाही....जम्मू में हिंसा में छह हिंदू मारे गए......पूरे देश में बंद के दौरान हर जगह हिंसक प्रदर्शन......श्री अमरनाथ श्रायन बोर्ड से ज़मीन वापस लेने का फरमान......एक ही दिन में कई बड़ी ख़बरें लेकिन सिर्फ और सिर्फ एनडीटीवी को छोड़कर एक भी चैनल पर ये ख़बरे नही..... दिखा रहे है दो कौड़ी के मीका के गाने....राजू श्रीवास्तव के हंसी ठठ्ठे या फिर कोई रिएलिटी शो...... चैनलों की स्ट्रेटेजी बनाने वाले ये भी भूल जाते है कि आखिर हम जनता को परोस क्या रहे है.... जनाब ज़रा ये भी तो सोचिए कि दर्शकों में बुद्धिजीवियों की भी कोई कमी नही है.....दो दो कौड़ी के स्पेशल जिन्हे सिर्फ आप और आपका चैनल ही स्पेशल कहता है उन पर कोई टिकता भी है या नंही.... ख़बरों से हटने का नतीजा कंही ये न हो कि न ख़बरों के रहे और न मनोरंजन के यानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का..... सब के सब अंधी दौड़ में दौड़ते जा रहे है....लेकिन इसका सबसे ज़्यादा फायदा हुआ है एनडीटीवी और टाईम्स नॉव को क्योंकि कम से कम इन चैनलों ने ख़बरिया चैनलों में अपना तमाशा नही बनने दिया.... ऐसे में सबसे ज़्यादा अगर कोई परेशान है तो वो है टीवी एंकर....कंही से अगर ग़लती से दो सांड़ों के लड़ते हुए शॉट्स आ गए या कंही कोई पति पत्नि लड़ पड़े और उनकी तस्वीरे कैमरे में कैद हो गई तो बस समझ लीजिए एंकर की मौत.....बनाने और कहने वाले कह देंगे आधे घंटे का स्पेशल...... अब बोलिए एक तस्वीर पर आधा घंटा और तो और घुस जाईए पति पत्नि के बेड़ रूम तक....... पीछे से फरमान ये कि इन्हे ऑन एयर लड़वा दो तो मज़ा आ जाए....... अब यंहा शुरू होता है एंकर का काम यानी एंकर खुद भी पके और जनता को भी पकाए....अगर बाहर निकल कर एंकर ने प्रोग्राम बनाने वाले की तारीफ कर दी तो शायद एंकर की भी तारीफ हो जाएगी....लेकिन अगर कुछ बुरा भला कह दिया....तो आप अच्छे एंकर नही है.....मान गए अफसरों को या कहे इस बंदर भालू के खेल तमाशे कराने वाले उस्तादों को......अब ऐसे में क्या होना चाहिए क्या.... लोग ऊब चुके है इन तमाशों को देख देख कर कोई एकाध घंटा ज़रूर ऐसा तमाशा दिखाईये लेकिन चैनल को तमाशा मत बनाईए.......