गुरुवार, 22 मई 2008

आखिर इतनी लापरवाही क्यों ?


14साल की आरूशी और उसके नौकर हेमराज की हत्या की गुत्थी सुलझने को ही नही आ रही....दिन ब दिन पेंच उलझता ही जा रहा है.....ऐसे में पुलिस की जांच पर सवालिया निशान लगे हुए है......सवाल जिनके जवाब पुलिस के पास नही है......

1पुलिस आरूशी की हत्या वाले दिन तलवार परिवार के घर पहुंची...तो सीधे नौकर हेमराज पर शक ज़ाहिर कर दिया.....और उसकी तलाश में कई राज्यों में टीमें लगा दी....लेकिन उसका शव उसी घर की छत पर अगले दिन पड़ा मिला.....

2नौकर का शव मिलने के बाद पुलिस का दावा कि ये मर्डर नौकर ने किया है ग़लत साबित हुआ और एक मर्डर कैस से ये सारा मामला दोहरे हत्याकांड़ में तबदील हो गया.....

३ उसके बाद पुलिस ने दूसरे नौकर विष्णु पर शक ज़ाहिर किया तो वो भी बेकसूर निकला....

4पुलिस ने कई दिन बीत जाने के बाद भी किसी को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की ज़हमत नही उठाई....जिससे हो सकता है वारदात करने वाले के मन से अब कानून और पुलिस का ड़र निकल गया हो....

5पुलिस ने डॉ तलवार के गैराज और क्लिनिक पर छापे मारने में करीब 5दिन से ज्यादा का समय ले लिया....

6पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में साफ आ गया कि ये काम किसी कसाई का या फिर डाक्टर का हो सकता है जिसने बड़े ही प्रोफेश्नल तरीके से ये हत्याए की है....कसाई की संभावना कम और डाक्टर की संभावना यंहा ज़्यादा दिखती है क्योंकि तलावर दंपति डाक्टर है......

7तलवार परिवार से पूछताछ करने में पुलिस सकुचाती रही...कई दिनों के बाद पूछताछ की गई वो भी बिना गिरफ्तारी या कम से कम हिरासत में लेकर वो ऐसा कर सकते थे.....

8पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का ब्यान आता है तलवार दंपति के ब्यानों में विरोधाभास है...क्या अंतर है...उस पर पुलिस ने क्या किया.....कोई कार्यवाही नही.....

9हत्या तेज़धार हथियारों से की गई....लेकिन इस वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियारों का भी अभी तक कुछ पता नही......

10वो पलंग का गद्दा जिस पर आरूशी सो रही थी वो दूसरे की छत पर क्यों सुखाया अपनी छत पर क्यों नही क्या परिवार को पता था कि अपनी छत पर शव पड़ा है.....

11शव को छत पर घसीट कर ले जाया गया....करीब करीब एक ही वक्त पर दो लोगों की हत्या और परिवार को कुछ आवाज़ नही आई......जबकि पुलिस के मुताबिक दोनों कत्ल तलवार दंपति के साथ वाले कमरे में हुए......

12आरूशी और हेमराज के मोबाईल डिटेल निकालने का ख्याल पुलिस को करीब 4दिन बाद आया.....

13दोनों को मारने का तरीका बिल्कुल एक जैसा......मारने का वक्त करीब करीब एक जैसा....ऐसा नही हो सकता कि दोनों को एक साथ मारा हो....अगर एक एक कर के मारा होता तो चीखा चिल्ली ज़रूर हुई होती....

14आरूशी की मां का कहना है कि वो रात में आरूशी के कमरे को ताला लगाती थी इसकी क्या वजह थी....जब चाभी आरूशी की मां के पास होती थी तो रात में कैसे किसी ने ताला खोल लिया तोड़ा नही...और दंपति को पता तक नही चला.....

15क्यों पुलिस ने किसी को हिरासत में नही लिया.....क्यों पुलिस ने सख्ती नही दिखाई.....

16पुलिस भी मानती है कि लापरवाही तो हुई है तभी तो अपने एसपी और थाना प्रभारी का ट्रांस्फर और निलंबन किया.....लेकिन बावजूद उसके नतीजा ढांक के तीन पात

17पुलिस ने क्यों कहा कि दो दिन में कातिल सबके सामने होगा जबकि उसके पास एक सबूत तक मौजूद नही था....ऐसे में दो दिन बाद मुंह की खाने के बाद पुलिस को अंदाज़ा नही कि अपराधी के हौंसले कितने बढ़े होंगे.....

18इतिहास ग्वाह है किसी भी कैस को सुलझाने के लिए सबूतों की ज़रूरत होती है लेकिन यंहा ऐसा लगता है कि पुलिस पहले अपराधी को पकड़ना चाहती है.....और पुलिस को लगता है सबूत बाद में मिल जाएंगे.....

19 पोस्टमार्टम में आया है आरूशी के साथ बलात्कार नही हुआ है....और न ही नौकर ने शराब पी रखी थी.....अगर नौकर या उसके किसी साथी ने आरूशी को मारना होता तो वो रात में जब तलावर दंपति घऱ पर मौजूद थे तब क्यों कत्ल करते.....आरूशी के स्कूल की छुट्टियां थी और तलवार दंपति अपने काम से रोज़ बाहर जाते है....उनकी गैर मौजूदगी में वो वारदात को अंजाम देते

20ऐसा भी हो सकता है कि नौकर हेमराज या आरूशी में से किसी एक की हत्या करनी हो और दूसरे ने देख लिया हो और मजबूरन उसे भी मार देना पड़ा हो.....

ऐसे बीसीयों और सवाल है जिन्हे जल्द से जल्द पुलिस को सुलझाना होगा....और समय निकलता गया जैसे कि निकलता जा रहा है....तो अपराधी को पकड़ना मुशिकल ही नही नामुमकिन हो जाएगा...क्योंकि अपराधी वारदात के बाद ड़रा होता है लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते जा रहे है वैसे वैसे कातिल से जो कोई ग़लतियां हुई भी होंगी वो ध्यान से उनसे पार पाता जा रहा होगा.....यंहा सवाल पुलिस की साख बचाने का नही है....यंहा अब सवाल है एक मासूम बच्ची को और उसके नौकर को कत्ल करने का उसकी वजह का और शातिर अपराधी को धर दबौंचने का.....हमेशा कहा जाता है कि अपराधी कोई न कोई सुराग छोड़ जाता है यंहा क्या सुराग छूट गया है उसे तलाशने की बेहद ज़रूरत है.....पुलिस की लापरवाही की हद या कहे कि जितनी किरकिरी होनी थी हो चुकी.....समझ में नही आता कि आखिर पुलिस ने क्यों दिखाई इतनी लापरवाही.....

मंगलवार, 13 मई 2008

नन्हें उस्तादों के लिए बड़ा खतरा


पूरी दुनियां में अगर नन्हे उस्तादों की बात करे तो उन आंकड़ों में भी भारत उस्ताद या कहे अव्वल स्थान पर है....हिंदुस्तान में 1 दिन के उस्तादों की उम्र से लेकर 14 साल के उस्तादों की तादाद करीब 3 करोड़ 38 लाख से भी ज़्यादा है.....इन बच्चों को उस्ताद कहने के पीछे मकसद है छोटी उम्र में इन बच्चों का मानसिक विकास इतनी तेज़ी से हो रहा है....देख कर हैरानी होती है.... अगर तो ये विकास पॉज़िटिव है तब तो समझ में आता है लेकिन अगर ये नेगेटिव होता जा रहा है तो सबसे बड़ा खतरा समझ लिजिए.....पिछले दिनों ख़बर आई कि केलिफोर्नियां में एक पांचवी क्लास का उस्ताद हथियार लेकर स्कूल गया करीब 12 बच्चों और एक टीचर को मौत के घाट उतार दिया.....अब आप कहेंगें कि विदेशों में तो ऐसा होता ही रहता है....लेकिन जनाब याद कीजिए गुड़गांव का यूरो इंटरनेश्नल स्कूल जंहा के छात्र ने अपने घर पर रखी रिवॉलवर से तीन गोलियां अपने साथी छात्र के शरीर में उतार दी और आठवी क्लास के छात्र की वंही पर मौत हो गई.....कई मनोवैञानिकों से बातचीत से पता चला कि इन सनसनीखेज़ वारदातों के पीछे बड़ा रोल है पर्दे पर हिंसा देखना.... कई साल पहले घर की महिलाएं दिन भर टीवी पर प्रोग्राम देखा करती थी....लेकिन अब पिछले दो सालों में उनकी तादाद में भारी कमी देखी गई....और उनकी जगह ले ली है नन्हे उस्तादों ने 3 साल से लेकर 10 साल तक की उम्र के बच्चों में किसी भी तरह के टीवी सीरियल देखने की ललक पैदा हो चुकी है.....हमारे साथ भी तीन बच्चे रहते है आरूशी उम्र पांच साल पसंदीदा चैनल एनडीटीवी इमेजिन उसमें धर्मवीर....रामयण....राधा की बेटियां कुछ कर दिखाएंगी.....जस्सू बेन जयंती लाल जोशी की ज्वाईंट फैमिली.......ऩच ले वे में सरोज खान.....शरारत....मतलब ये कि शायद जितने भी सीरियल आते है वो सब पसंद है यानी जो आ रहा है वो देख सकते है.....दूसरा बच्चा पाखी उम्र 4 साल....जिसे पसंद है एनिमेटिड फिल्मस.....कार्टून्स.......बाल गणेशा....हनुमान.....हैरी पार्टर....और ढे़र सारी विडियो गेम्स....और तीसरा बच्चा है परी.....उम्र मात्र 11 महिने......लेकिन टीवी के चलते ही सारे खिलौने छोड़कर टीवी की तरफ एकटक देखना और 11 महिने के बच्चे को भी पता चलता है कि टीवी बंद हो गया अब रोना है.....कई बार सोच कर थोड़ा ड़र लगता है कि बच्चे जो देख रहे है या जो चैनल अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए बच्चों को परोस रहे है वो देखने दिखाने लायक है या नही.....कुछ समय पहले दिल्ली हाई कोर्ट के जज साहब को एक बच्ची ने चिट्ठी लिखी कि उसे गुड़िया या डॉल से ड़र लगता है क्योंकि उसमें उसे भूत दिखता है.....उसे रात होते ही ड़र लगता है ये बच्चे की नासमझी या ड़र नही बल्कि एक मानसिक बीमारी है जो कि चैनल ने दी है...... बच्चों के लिए एक कार्टून टीवी में जारी है शीन शेन....समझ में नही आता कि कोई भी अभिभावक कैसे उस कार्टून को देखने की इजाज़त अपने बच्चों को देख सकता है.....इस कार्टून का पात्र किसी की इज़्जत की दो कौड़ी की करने में दो सैकेंड़ लगाता है फिर चाहे वो उसकी मां हो पिता हो टीचर या घर आए मेहमान.....नही समझ में आता कि एक ऐसा कार्यक्रम जिसका मकसद सिर्फ बच्चों को बदतमीज़ी सिखाना है बावजूद उसकी टीआरपी रेटिंग काफी अच्छी है.....उसे क्यों देखा जाता है शायद हर मातापिता के ज़हन में ये सवाल ज़रूर आता होगी.......टीवी सीरियलज़ में खून खराबा...धोखा देना.....अपराध करना और बच निकलना.....उस्ताद सब सीख रहे है.....विम्हेन्स अस्पताल के डाक्टर जितेंद्र नागपाल से बात हुई तो उनके मुताबिक टेलिवज़न बच्चों के नेचर में ज़बरदस्त बदलाव कर रहा है.....उनकी सेहत और आंखों पर तो इसका बुरा प्रभाव पड़ ही रहा है.....साथ ही उनकी जीवनशैली उनमें बदले की भावना......आल्स्य......झूठ बोलने की आदत.....आंखों की कमज़ोरी....बड़ी तेज़ी से फैलते जा रहे है.....एक सर्वे के मुताबिक बच्चा टीवी से बहुत जल्दी सीखता है......अब ये टीवी के प्रोग्राम पर निर्भर करता है कि वो तेज़ी से सिखा क्या रहे है सही या ग़लत.......कम शब्दों में छोटा संदेश बच्चों को जब माता पिता की ज़रूरत हो तो माता पिता मिल जांए टीवी नही और जब खेल या शारीरिक क्षमताओं को बढ़ाने की ज़रूरत हो तो बच्चा सोफे पर बैठ कर विडियो गेम्स न देखे बल्कि मैदान में उतरे़











सोमवार, 12 मई 2008

हम तैयार हैं तबाही के लिए


देख किसी के रस्ते की दिवार कभी न होना. जब तक जागे तेरा पड़ोसी तब तक तू न सोना. लेकिन लगता है ये कि बाते अब किताबी भी नही रही. हम तैयार है हर तरह की लड़ाई लड़ने के लिए. फिर चाहे वो ज़मीनी लड़ाई हो, आसामान में हो अंतरिक्ष में है बायलौजिकल हो कैमिकल हो कंम्प्यूटर वार हो हम तैयार है. ये बात छोटे से छोटा देश कह सकता है और जो नही कह सकता उसे कमज़ोर माना जाता है और वो देश भी दौड़ पड़ता है इस अंधी दौड़ में. एक नज़र डालते है किस के पास क्या है सबसे पहले दो शक्तियों की बात करते है रशिया के पास 16,000 से ज़्यादा परमाणु हथियार मौजूद है. अमेरिका के पास 10,300 से ज़्यादा, चीन के पास 410 से ज़्यादा फ्रास के पास 350 और ब्रिटेन के पास करीब 200. अब आप चौंकेगें एक ऐसे देश के परमाणु हथियार को सुनकर जो हमेशा अपने आस्तित्व की लड़ाई लड़ता आया है और सबसे छोटे देशों में से एक है इज़राईल उसके पास भी करीब 100 से लेकर 170 हथियार मौजूद है अब बात भारत और पाकिस्तान की भारत के पास ये तादाद 75 से 110 है और पाकिस्तान के पास ये तादाद 50 से 100 के करीब मौजूद है. इनमें कई इतघातक है कि एक एक हथियार से कई कई बार धरती को खत्म किया जा सकता है. ये लेख ड़राने के लिए नही बल्कि सच्चाई से रूबरू कराने की एक कोशिश है. जब पाकिस्तान कोई भी परीक्षण करता है तो उसकी मारक क्षमता भारत पर मापी जाती है दिल्ली मुम्बई इसकी चपेट में आ सकते है भारत कोई परीक्षण करता है तो लाहौर करांची तक इसकी मार हो सकती है सभी देशों का यही हाल है और शायद ऐसा इसलिए क्योंकि एक तो हमने ये हथियार बना लिया है और दूसरा हम तुम्हे इसके बल पर आंख भी दिखा रहे है. पाकिस्तान की तरफ से ये ब्यान आता है हम सालों साल घांस खाएंगें लेकिन हथियार और बम बनाएंगें. एक नज़र डालिए सैनिकों की तादाद पर चीन के पास कुल मिलाकर जल थल और वायु सैनिकों की तादाद करीब 2 करोड़ 25 लाख से ज़्यादा....अमेरिका की बात करें तो 1 करोड़ 50 लाख के करीब सैनिक मौजूद है.....भारत के पास ये तादाद करीब 1 करोड़ 32 लाख से ज़्यादा है....नार्थ कोरिया और रशिया के पास एक एक करोड़ से ज़्यादा सैनिक मौजूद है. पूरी दुनियां में ऐसा कोई देश नही जंहा के सभी बाशिदे भर पेट सोते होकिन आज पेट की आग बुझे न बुझे लेकिन गु्स्से की आग को बुझाने के सभी इंतज़ाम करते जा रहे है.....हम तैयार है तबाही के लिए ज़मीन की आकाश की अंतरिक्ष की चांद की ग्रहों की.....हम सबसे ताकतवर हो गए है. इस दुनियां को ऐसा तबाह कर सकते है कि फिर कंही जीवन संभव ही न हो सके. और हां एक बात और अगर कोई हमें तबाह करने की सोचेगा तो हम तो डूबेंगें ही सनम तुमको भी साथ लेकर डूबेंगे.....अमेरिका की आर्थिक मंदी अपने चरम पर पुहंचेंगी... रशिया को विश्व शक्ति माना जाए या नही इस पर बहस जारी है....पाकिस्तान के परमाणु हथियार अगर आतंकियों के हत्थे चढ़ गए तो क्या.....अरब इज़राईल का गुस्सा कंहा जाकर थमेगा कोई नही बता सकता.....कब बुझेगी ये आग..... अफगानिस्तान के सौ सौ रूपये के टैंटों को आतंकी कैंप समझ कर उनपर सौ सौ करोड़ रूपये के बम गिराना अमेरिका को कितना भारी पड़ा ये वंहा का प्रशासन जानता है.....अपनी सुरक्षा बेहद अहम होती है लेकिन उसके लिए हथियारों की अंधी दौड़ में दौड़ जाना अकलमंदी तो नही... कहा जा सकता है हम तैयार है अपनी और दूसरों की तबाही के लिए.......

रविवार, 11 मई 2008

अब कंहा जाएं हम


झारखंड़ की सरकार के मुताबिक अब सरकार के पास इतना पैसा नही कि वो अब रांची और दूसरे शहरों में मौजूद चिड़ियाघरों के जानवरों का रख रखाव ठीक तरीके से कर सके. बिना धन के वो इन जानवरों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा नही कर सकती. राज्य सरकार के मुताबिक उनके रोज के खाने पीने का ही हिसाब किताब जोड़ा जाए तो वो ही हज़ारो में बैठता है. सरकार को शायद ये हज़ारों रूपये भी अब भारी पड़ने लगे है. लेकिन सरकार ने अपने मंत्रियों विधायकों और पार्षदों के पदों और तन्नख्वाहों में जो इज़ाफा किया है शायद वो खर्च इन बेज़ुबान जानवरों की पेट की आग से कंही ज़्यादा ज़रूरी था. अब सरकार की और चिड़ियाघर की तरफ से फरियाद ये की जा रही कि लोग अब आगे आए और एक एक करके जानवरों को गोद ले ले. हालांकि चिडियाघर से जानवरों को गोद लेने का ये मतलब कतई नही की लोग उन्हे अपने धर ले जाए. लेकिन ये हो सकता है कि लोग हफ्ते में एक या दो बार अपने प्यारे और गोद लिए हुए जानवरों के पास आएं और उन्हें खिलाए पिलाए. ऐसे में आम लोगों को किसी एक या दो जानवरों को गोद लेने के लिए एक रजिस्ट्रेशन करवाना होगा. जिसके लिए कोई भी फीस नही ली जाएगी. ऐसे इश्तिहार भी चिड़ियाघर प्रशासन ने सार्वजनिक स्थानों पर चिपका दिए है. लेकिन इसके बावजूद भी किसी भी जानवर के लिए कोई रजिस्ट्रेशन नही कराया गया. ज़ाहिर है इस महंगाई के दौर में चिडियाघर घूमने वाले लोग अपने बच्चों को पाल ले शायद वो भी काफी होगा. लेकिन सरकार और चिड़ियाघर प्रशासन की इस कोशिश को काबिलेतारिफ कहा जाए या फिर चुल्लू भर पानी में डूब मरने की हिदायत दे दी जाए. लोगों से बातचीत में पाया कि पहले सरकार अपने और अपने मंत्रियों के खर्चे कम करे उसके बाद भी ये नौबत नही आनी चाहिए कि जो जानवर पिंजरे में बंद है और उसे देखने के लिए सरकार लोगों से टिकट खरीदवा रही है उनकी भी रोटियां गिननी पड़ रही हैं. हैरानी होती है फिंलैंड या जापान जैसे छोटे देशों में जब मौसम बदलता है तो जानवरों के लिए सर्दियों में ताप और गर्मियों में कूलर और ए सी की व्यवस्था की जाती है. जंहा कोई मादा जानवर प्रजनन की प्रकिया में होती है वंहा उसे और उसके बच्चों को बचाने के लिए कई मिलियन डालर्स खर्च कर दिए जाते है. वंही हमारे देश के कई राज्यों में जानवरों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. ऐसे में सवाल उठता है उस सरकार पर जिसने कह दिया कि उसके पास जानवरों के खाने पीने के लिए पैसा नही है लोग पाल सके तो पाल ले. यही सरकार अगर अपने राज्य के लिए दूसरे राज्यों को कह दे कि उसके पास अपने लोगों को रोटी देने के लिए पैसा नही है तुम पाल सको तो पाल लो. झारखंड़ को अगर उत्तर प्रदेश पाल ले या फिर तमिलनाडू को केरल पाल ले. इस बात में अतिश्योक्ति ज़रूर हो सकती है लेकिन किसी ने पिछले दस साल पहले नही सोचा होगा कि राज्य सरकार मोर चिड़िया शेर चीते हाथी हिरण को रोटियां देने में भी असर्मथ हो जाएगी. ऐसे में जब राज्य के बड़़े अधिकारियों से पूछा गया तो मुंह छिपाने के सिवा कोई चारा नही था कि ऐसा नही है जांच होगी. लेकिन अगर ऐसा है तो जानवर अपनी ज़ुबां से तो नही बोल सकता लेकिन कंही न कंही मन में तो ज़रूर सोचता होगा कि अब कंहा जाएं हम क्योंकि वो तो हड़ताल और प्रदर्शन करना भी नही जानता. ज़रा सोचिेए