
पूरी दुनियां में अगर नन्हे उस्तादों की बात करे तो उन आंकड़ों में भी भारत उस्ताद या कहे अव्वल स्थान पर है....हिंदुस्तान में 1 दिन के उस्तादों की उम्र से लेकर 14 साल के उस्तादों की तादाद करीब 3 करोड़ 38 लाख से भी ज़्यादा है.....इन बच्चों को उस्ताद कहने के पीछे मकसद है छोटी उम्र में इन बच्चों का मानसिक विकास इतनी तेज़ी से हो रहा है....देख कर हैरानी होती है.... अगर तो ये विकास पॉज़िटिव है तब तो समझ में आता है लेकिन अगर ये नेगेटिव होता जा रहा है तो सबसे बड़ा खतरा समझ लिजिए.....पिछले दिनों ख़बर आई कि केलिफोर्नियां में एक पांचवी क्लास का उस्ताद हथियार लेकर स्कूल गया करीब 12 बच्चों और एक टीचर को मौत के घाट उतार दिया.....अब आप कहेंगें कि विदेशों में तो ऐसा होता ही रहता है....लेकिन जनाब याद कीजिए गुड़गांव का यूरो इंटरनेश्नल स्कूल जंहा के छात्र ने अपने घर पर रखी रिवॉलवर से तीन गोलियां अपने साथी छात्र के शरीर में उतार दी और आठवी क्लास के छात्र की वंही पर मौत हो गई.....कई मनोवैञानिकों से बातचीत से पता चला कि इन सनसनीखेज़ वारदातों के पीछे बड़ा रोल है पर्दे पर हिंसा देखना.... कई साल पहले घर की महिलाएं दिन भर टीवी पर प्रोग्राम देखा करती थी....लेकिन अब पिछले दो सालों में उनकी तादाद में भारी कमी देखी गई....और उनकी जगह ले ली है नन्हे उस्तादों ने 3 साल से लेकर 10 साल तक की उम्र के बच्चों में किसी भी तरह के टीवी सीरियल देखने की ललक पैदा हो चुकी है.....हमारे साथ भी तीन बच्चे रहते है आरूशी उम्र पांच साल पसंदीदा चैनल एनडीटीवी इमेजिन उसमें धर्मवीर....रामयण....राधा की बेटियां कुछ कर दिखाएंगी.....जस्सू बेन जयंती लाल जोशी की ज्वाईंट फैमिली.......ऩच ले वे में सरोज खान.....शरारत....मतलब ये कि शायद जितने भी सीरियल आते है वो सब पसंद है यानी जो आ रहा है वो देख सकते है.....दूसरा बच्चा पाखी उम्र 4 साल....जिसे पसंद है एनिमेटिड फिल्मस.....कार्टून्स.......बाल गणेशा....हनुमान.....हैरी पार्टर....और ढे़र सारी विडियो गेम्स....और तीसरा बच्चा है परी.....उम्र मात्र 11 महिने......लेकिन टीवी के चलते ही सारे खिलौने छोड़कर टीवी की तरफ एकटक देखना और 11 महिने के बच्चे को भी पता चलता है कि टीवी बंद हो गया अब रोना है.....कई बार सोच कर थोड़ा ड़र लगता है कि बच्चे जो देख रहे है या जो चैनल अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए बच्चों को परोस रहे है वो देखने दिखाने लायक है या नही.....कुछ समय पहले दिल्ली हाई कोर्ट के जज साहब को एक बच्ची ने चिट्ठी लिखी कि उसे गुड़िया या डॉल से ड़र लगता है क्योंकि उसमें उसे भूत दिखता है.....उसे रात होते ही ड़र लगता है ये बच्चे की नासमझी या ड़र नही बल्कि एक मानसिक बीमारी है जो कि चैनल ने दी है...... बच्चों के लिए एक कार्टून टीवी में जारी है शीन शेन....समझ में नही आता कि कोई भी अभिभावक कैसे उस कार्टून को देखने की इजाज़त अपने बच्चों को देख सकता है.....इस कार्टून का पात्र किसी की इज़्जत की दो कौड़ी की करने में दो सैकेंड़ लगाता है फिर चाहे वो उसकी मां हो पिता हो टीचर या घर आए मेहमान.....नही समझ में आता कि एक ऐसा कार्यक्रम जिसका मकसद सिर्फ बच्चों को बदतमीज़ी सिखाना है बावजूद उसकी टीआरपी रेटिंग काफी अच्छी है.....उसे क्यों देखा जाता है शायद हर मातापिता के ज़हन में ये सवाल ज़रूर आता होगी.......टीवी सीरियलज़ में खून खराबा...धोखा देना.....अपराध करना और बच निकलना.....उस्ताद सब सीख रहे है.....विम्हेन्स अस्पताल के डाक्टर जितेंद्र नागपाल से बात हुई तो उनके मुताबिक टेलिवज़न बच्चों के नेचर में ज़बरदस्त बदलाव कर रहा है.....उनकी सेहत और आंखों पर तो इसका बुरा प्रभाव पड़ ही रहा है.....साथ ही उनकी जीवनशैली उनमें बदले की भावना......आल्स्य......झूठ बोलने की आदत.....आंखों की कमज़ोरी....बड़ी तेज़ी से फैलते जा रहे है.....एक सर्वे के मुताबिक बच्चा टीवी से बहुत जल्दी सीखता है......अब ये टीवी के प्रोग्राम पर निर्भर करता है कि वो तेज़ी से सिखा क्या रहे है सही या ग़लत.......कम शब्दों में छोटा संदेश बच्चों को जब माता पिता की ज़रूरत हो तो माता पिता मिल जांए टीवी नही और जब खेल या शारीरिक क्षमताओं को बढ़ाने की ज़रूरत हो तो बच्चा सोफे पर बैठ कर विडियो गेम्स न देखे बल्कि मैदान में उतरे़
1 टिप्पणी:
साधुवाद.. ये हमारा वक्त एक अराजक दौर है
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