रविवार, 11 मई 2008

अब कंहा जाएं हम


झारखंड़ की सरकार के मुताबिक अब सरकार के पास इतना पैसा नही कि वो अब रांची और दूसरे शहरों में मौजूद चिड़ियाघरों के जानवरों का रख रखाव ठीक तरीके से कर सके. बिना धन के वो इन जानवरों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा नही कर सकती. राज्य सरकार के मुताबिक उनके रोज के खाने पीने का ही हिसाब किताब जोड़ा जाए तो वो ही हज़ारो में बैठता है. सरकार को शायद ये हज़ारों रूपये भी अब भारी पड़ने लगे है. लेकिन सरकार ने अपने मंत्रियों विधायकों और पार्षदों के पदों और तन्नख्वाहों में जो इज़ाफा किया है शायद वो खर्च इन बेज़ुबान जानवरों की पेट की आग से कंही ज़्यादा ज़रूरी था. अब सरकार की और चिड़ियाघर की तरफ से फरियाद ये की जा रही कि लोग अब आगे आए और एक एक करके जानवरों को गोद ले ले. हालांकि चिडियाघर से जानवरों को गोद लेने का ये मतलब कतई नही की लोग उन्हे अपने धर ले जाए. लेकिन ये हो सकता है कि लोग हफ्ते में एक या दो बार अपने प्यारे और गोद लिए हुए जानवरों के पास आएं और उन्हें खिलाए पिलाए. ऐसे में आम लोगों को किसी एक या दो जानवरों को गोद लेने के लिए एक रजिस्ट्रेशन करवाना होगा. जिसके लिए कोई भी फीस नही ली जाएगी. ऐसे इश्तिहार भी चिड़ियाघर प्रशासन ने सार्वजनिक स्थानों पर चिपका दिए है. लेकिन इसके बावजूद भी किसी भी जानवर के लिए कोई रजिस्ट्रेशन नही कराया गया. ज़ाहिर है इस महंगाई के दौर में चिडियाघर घूमने वाले लोग अपने बच्चों को पाल ले शायद वो भी काफी होगा. लेकिन सरकार और चिड़ियाघर प्रशासन की इस कोशिश को काबिलेतारिफ कहा जाए या फिर चुल्लू भर पानी में डूब मरने की हिदायत दे दी जाए. लोगों से बातचीत में पाया कि पहले सरकार अपने और अपने मंत्रियों के खर्चे कम करे उसके बाद भी ये नौबत नही आनी चाहिए कि जो जानवर पिंजरे में बंद है और उसे देखने के लिए सरकार लोगों से टिकट खरीदवा रही है उनकी भी रोटियां गिननी पड़ रही हैं. हैरानी होती है फिंलैंड या जापान जैसे छोटे देशों में जब मौसम बदलता है तो जानवरों के लिए सर्दियों में ताप और गर्मियों में कूलर और ए सी की व्यवस्था की जाती है. जंहा कोई मादा जानवर प्रजनन की प्रकिया में होती है वंहा उसे और उसके बच्चों को बचाने के लिए कई मिलियन डालर्स खर्च कर दिए जाते है. वंही हमारे देश के कई राज्यों में जानवरों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. ऐसे में सवाल उठता है उस सरकार पर जिसने कह दिया कि उसके पास जानवरों के खाने पीने के लिए पैसा नही है लोग पाल सके तो पाल ले. यही सरकार अगर अपने राज्य के लिए दूसरे राज्यों को कह दे कि उसके पास अपने लोगों को रोटी देने के लिए पैसा नही है तुम पाल सको तो पाल लो. झारखंड़ को अगर उत्तर प्रदेश पाल ले या फिर तमिलनाडू को केरल पाल ले. इस बात में अतिश्योक्ति ज़रूर हो सकती है लेकिन किसी ने पिछले दस साल पहले नही सोचा होगा कि राज्य सरकार मोर चिड़िया शेर चीते हाथी हिरण को रोटियां देने में भी असर्मथ हो जाएगी. ऐसे में जब राज्य के बड़़े अधिकारियों से पूछा गया तो मुंह छिपाने के सिवा कोई चारा नही था कि ऐसा नही है जांच होगी. लेकिन अगर ऐसा है तो जानवर अपनी ज़ुबां से तो नही बोल सकता लेकिन कंही न कंही मन में तो ज़रूर सोचता होगा कि अब कंहा जाएं हम क्योंकि वो तो हड़ताल और प्रदर्शन करना भी नही जानता. ज़रा सोचिेए

2 टिप्‍पणियां:

पुनेठा ने कहा…

wah kya bat, hai, sacha aapne kamzor kadi pakdi hai, lage rahiye

Unknown ने कहा…

सरकार के पास पैसा नहीं है, यह बात गले नहीं उतरती. नेताओं और सरकारी बाबुओं की जेबें बड़ी हो गई हैं. उन की पैसे की भूख और ज्यादा बढ़ गई है. मेने किशन चंदर की एक कहानी पढ़ी थी. सरकारी खर्चे को कम करने के अभियान में एक बिल्ली नौकरी से निकाल दी गई थी. जंगल विभाग ने इस बिल्ली को चूहों को मारने के लिए रखा था, जो फाइलें कुतर जाते थे. आधा किलो दूध इस बिल्ली को तनखाह के रूप में मिलता था. दौरे पर आए मंत्री जी को यह खर्चा इतना बुरा लगा कि उन्होंने मौके पर ही बिल्ली को नौकरी से निकाल दिया और सरकारी खर्चे में कटौती कर दी.